Wednesday, August 25, 2010

बचपन

मासूम सा दिल है, सारा जहान अपनाते है।
रंग है इतने ख्वाबो में सारी दुनिया सजाते है।
हँसते है, मुस्कुराते है ,भोलेपन से बादलों को रिझाते है।
झूमते हैं, चहकते हैं ,बरसते पानी में महकते है;
थम जो जाये बारिश घर पर रहा नहीं करते है।
मस्ती भरे मन को लेकर खेलने हम निकलते हैं;
कपडे ही हुए हैं गंदे परवाह नहीं करते है।
खेल छोड़कर कैसे घर जा सकते है;
हो जाने दो देर थोड़ी डांट हम सह सकते है।
जब गंदे कपड़ो में घर पहुचते हैं,
मम्मी डांट लगाया करती है,
मासूम चेहरे से पिघलकर फिर हमें खिलाया करती है।
और पापा जब भी डांटे हमें छिपाया करती है।
आज तो सन्नाटे में वो
डांट हमें लुभाती है।
और वो मीठी सी याद दर्द में भी मुस्कराहट ले आती है