Thursday, November 21, 2013

Talash

ख्वाबो कि तलाश में मंज़िल कंही खो गए,
चल पड़े हम रहो में पर सपने कंही सो गए.

ज़िंदा हैं हम, है  सांस अभी चलती,
पर न जाने धड़कने क्यों  चुप से हो गये। 

क्यों थकी  हुई सी नींद आती है,क्यों ख्वाहिशे नहीं सताती है,
क्यों बेरंग लगे दुनिआ , मेरी आँखे ही क्यों रंग चुराती  है। 

है सवाल खुद से क्यों खुद को छुपाये बैठा हूँ ,
खामोश हूँ  या मस्तियाँ लुटाये  बैठा हूँ। 

उड़ना चाहूँ गगन में पर साँस भी साथ छोड़ देती हैं ,
हंसना चाहूँ खुल  के पर अश्क भी मुह मोड़ लेती है। 

Tuesday, March 12, 2013

Holi

लाल, गुलाबी, हरा, नीला, रंगो  का अनोखा ये त्यौहार है.
सभी दिखे एक से, मानो  अपनों का ही संसार है.
नयी सोच नयी खुशिया ये त्यौहार  लाता है.
छोटी सी पिचकारी ही, नन्ही आँखों को  खुशिया दे  जाता  है।
उंच नीच, अमीर गरीब सारे भेद मिट  जाते है,
जब प्यार से हम सबको गले लगते है.
पर अब  न जाने क्यों ....... न रंग दिखे, न अपनापन।
मत भेद और परेशानी ही नज़र आती है,
पूछती है आँखें, क्यों रंगों को जुदा किया .
सभी है अपने, फिर क्यों उनको खुद से जुदा किया ।
क्या हम इसी तरह जीते जायेगे,
या रंगों के इस त्यौहार को इसके सही आयाम दे पाएंगे?