Thursday, November 21, 2013

Talash

ख्वाबो कि तलाश में मंज़िल कंही खो गए,
चल पड़े हम रहो में पर सपने कंही सो गए.

ज़िंदा हैं हम, है  सांस अभी चलती,
पर न जाने धड़कने क्यों  चुप से हो गये। 

क्यों थकी  हुई सी नींद आती है,क्यों ख्वाहिशे नहीं सताती है,
क्यों बेरंग लगे दुनिआ , मेरी आँखे ही क्यों रंग चुराती  है। 

है सवाल खुद से क्यों खुद को छुपाये बैठा हूँ ,
खामोश हूँ  या मस्तियाँ लुटाये  बैठा हूँ। 

उड़ना चाहूँ गगन में पर साँस भी साथ छोड़ देती हैं ,
हंसना चाहूँ खुल  के पर अश्क भी मुह मोड़ लेती है।