ख्वाबो कि तलाश में मंज़िल कंही खो गए,
चल पड़े हम रहो में पर सपने कंही सो गए.
ज़िंदा हैं हम, है सांस अभी चलती,
पर न जाने धड़कने क्यों चुप से हो गये।
क्यों थकी हुई सी नींद आती है,क्यों ख्वाहिशे नहीं सताती है,
क्यों बेरंग लगे दुनिआ , मेरी आँखे ही क्यों रंग चुराती है।
है सवाल खुद से क्यों खुद को छुपाये बैठा हूँ ,
खामोश हूँ या मस्तियाँ लुटाये बैठा हूँ।
उड़ना चाहूँ गगन में पर साँस भी साथ छोड़ देती हैं ,
हंसना चाहूँ खुल के पर अश्क भी मुह मोड़ लेती है।
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