अप्रैल का महीना है , बोनस को लुभाते है,
चंद बूंदो से अपनी तृष्णा बुझाते है ,
हर साल पानी की ये बौछार आती है सूखे के बाद,
पर बौछारें कंहा अकाल मिटा पाती है,
जरा प्यास तो बढ़ा , न ऐसे तू उसे दबा ,
ये प्यास ही तो तुझे तेरी मज़िल तक पहुचायेगी ,
वरना ज़िन्दगी है, वो तो यु ही बीत जाएगी।
चंद बूंदो से अपनी तृष्णा बुझाते है ,
हर साल पानी की ये बौछार आती है सूखे के बाद,
पर बौछारें कंहा अकाल मिटा पाती है,
जरा प्यास तो बढ़ा , न ऐसे तू उसे दबा ,
ये प्यास ही तो तुझे तेरी मज़िल तक पहुचायेगी ,
वरना ज़िन्दगी है, वो तो यु ही बीत जाएगी।
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