Tuesday, March 12, 2013

Holi

लाल, गुलाबी, हरा, नीला, रंगो  का अनोखा ये त्यौहार है.
सभी दिखे एक से, मानो  अपनों का ही संसार है.
नयी सोच नयी खुशिया ये त्यौहार  लाता है.
छोटी सी पिचकारी ही, नन्ही आँखों को  खुशिया दे  जाता  है।
उंच नीच, अमीर गरीब सारे भेद मिट  जाते है,
जब प्यार से हम सबको गले लगते है.
पर अब  न जाने क्यों ....... न रंग दिखे, न अपनापन।
मत भेद और परेशानी ही नज़र आती है,
पूछती है आँखें, क्यों रंगों को जुदा किया .
सभी है अपने, फिर क्यों उनको खुद से जुदा किया ।
क्या हम इसी तरह जीते जायेगे,
या रंगों के इस त्यौहार को इसके सही आयाम दे पाएंगे?


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